MP में 150 छोटे स्कूल बंद: सांदीपनी में मर्ज, सुविधाएं बढ़ेंगी लेकिन परिवहन चिंता
150 small schools closed in MP | भोपाल/ग्वालियर, 22 नवंबर 2025: मध्य प्रदेश के करीब 92 हजार से अधिक सरकारी स्कूलों में से ग्वालियर-चंबल संभाग के 150 छोटे-छोटे स्कूलों पर अगले शिक्षण सत्र से ताला लगने वाला है। एक से तीन किलोमीटर के दायरे में स्थित इन कम छात्र संख्या वाले स्कूलों को सांदीपनी विद्यालयों में मर्ज किया जा रहा है। शिक्षा विभाग का दावा है कि यह कदम शिक्षा गुणवत्ता को मजबूत करेगा, लेकिन ग्रामीण इलाकों में परिवहन की कमी और सामाजिक प्रभाव को लेकर अभिभावकों व विशेषज्ञों में चिंता का माहौल है। आइए, इस फैसले के सभी पहलुओं पर विस्तार से नजर डालें।
कम छात्र संख्या वाले स्कूल: संसाधनों की बर्बादी या सुधार की जरूरत?
स्कूल शिक्षा विभाग के अधिकारियों के अनुसार, संभाग में बड़ी संख्या ऐसे स्कूल हैं जहां छात्रों की संख्या 15 से भी कम है। कई जगहों पर एक ही शिक्षक पूरे स्कूल को संभाल रहा है। विभाग का तर्क है कि इतने छोटे स्कूलों पर स्टाफ, भवन और संसाधनों का खर्च शिक्षा की गुणवत्ता को प्रभावित कर रहा है। इसलिए, तीन किलोमीटर की परिधि में आने वाले इन स्कूलों को सांदीपनि स्कूलों में मर्ज किया जा रहा है। इससे बच्चों को बेहतर इंफ्रास्ट्रक्चर, लैब, स्मार्ट क्लासरूम और प्रशिक्षित शिक्षक मिल सकेंगे।
लोक शिक्षण ग्वालियर के संयुक्त संचालक अरविंद सिंह ने बताया, “संभाग के कई सांदीपनि स्कूल नए भवनों में शिफ्ट हो चुके हैं, जबकि कुछ का निर्माण जारी है। सरकारी विद्यालयों के छात्रों को सांदीपनि स्कूलों में दाखिला दिया जाएगा।” यह प्रक्रिया पहले ही शुरू हो चुकी है, और नजदीकी सरकारी स्कूलों के छात्रों को सांदीपनी स्कूलों में भर्ती कराया जा रहा है।
ग्रामीण क्षेत्रों में चुनौतियां: परिवहन की कमी सबसे बड़ा रोड़ा
ग्वालियर, दतिया, मुरैना, भिंड, गुना, शिवपुरी, श्योपुर और अशोकनगर जिलों में अधिकांश छोटे स्कूल गांवों के बीच या नजदीक स्थित हैं। ग्रामीण इलाकों में परिवहन सुविधाएं पहले से ही सीमित हैं। अभिभावकों का सवाल है: 1 से 5 किलोमीटर दूर सांदीपनि स्कूल तक बच्चों को कैसे पहुंचाया जाएगा? खासकर छोटे बच्चे पैदल इतनी दूरी तय नहीं कर सकते। सरकारी बस या वाहन की व्यवस्था अभी उपलब्ध नहीं है, और निजी ऑटो का खर्च हर परिवार afford नहीं कर सकता।
शिक्षा विभाग के रिटायर्ड प्राचार्य और हेडमास्टरों का कहना है कि गांव के स्कूल न केवल पढ़ाई का केंद्र हैं, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक गतिविधियों में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। स्कूल गांव के बीच होने से अभिभावक आसानी से बच्चों पर नजर रख पाते हैं। दूरी बढ़ने से अभिभावकों की भागीदारी कम होगी, और छोटे बच्चों व खासकर लड़कियों की शिक्षा पर प्रतिकूल असर पड़ सकता है। स्थानीय स्तर पर डर है कि स्कूल बंद होने से गांव में शिक्षा का माहौल कमजोर पड़ जाएगा।
बंद स्कूलों का क्या होगा? भवन, फर्नीचर और रिकॉर्ड सुरक्षित
शिक्षा विभाग के दिशा-निर्देशों के मुताबिक, बंद होने वाले स्कूलों के डाइस कोड (पहचान चिन्ह) जिंदा रहेंगे। भविष्य में जरूरत पड़ने पर इसी कोड से दूसरे स्थान पर स्कूल खोला जा सकेगा। भवन ग्राम पंचायत या स्थानीय निकाय की संपत्ति बने रहेंगे, और इनका उपयोग ग्राम सभा भवन, सामुदायिक केंद्र या आंगनवाड़ी के रूप में किया जा सकता है।
- फर्नीचर और सामग्री: स्कूल का फर्नीचर, लाइब्रेरी की किताबें, लैब उपकरण और कंप्यूटर नजदीकी सांदीपनि या अन्य सक्रिय स्कूलों में स्थानांतरित किए जाएंगे।
- रिकॉर्ड: छात्रों के नामांकन रिकॉर्ड और शैक्षणिक दस्तावेज ब्लॉक शिक्षा कार्यालय में सुरक्षित रखे जाएंगे।
ये स्कूल खाली तो होंगे, लेकिन उनका डाइस कोड खत्म नहीं होगा। जरूरत के आधार पर इन्हीं कोड पर नए क्षेत्रों में स्कूल खोले जा सकेंगे।
शिक्षा गुणवत्ता में सुधार का सरकारी दावा: सांदीपनी स्कूलों की ताकत
अधिकारियों का स्पष्ट तर्क है कि सांदीपनि स्कूलों को सीएम राइज मॉडल के तहत विकसित किया जा रहा है, जहां सुविधाएं किसी प्राइवेट स्कूल से कम नहीं होंगी। इनमें स्मार्ट क्लासरूम, ई-लर्निंग, लाइब्रेरी, लैब, खेल का मैदान और बेहतर प्रशिक्षित शिक्षक शामिल हैं – जो छोटे स्कूलों में संभव नहीं। 20 छात्रों वाले स्कूल चलाना संसाधनों की बर्बादी माना जा रहा है।
शिक्षकों के लिए भी नई व्यवस्था: 55 वर्ष से कम आयु वाले शिक्षकों को अनिवार्य रूप से सांदीपनि स्कूलों में समायोजित किया जाएगा, ताकि उनके ज्ञान और टीचिंग स्किल का बेहतर उपयोग हो सके। इससे शिक्षा की गुणवत्ता में उल्लेखनीय सुधार की उम्मीद है।
छात्रों और शिक्षकों के सामने नई परेशानियां
- छात्रों की समस्या: घर से 3-5 किलोमीटर की दूरी और परिवहन की कमी। ग्रामीण क्षेत्रों में बस सुविधा न होने से बच्चे प्रभावित होंगे।
- शिक्षकों की चिंता: नए स्कूलों में अनिवार्य पदस्थापना से कई शिक्षक अपने गांव से दूर चले जाएंगे। खासकर महिला शिक्षिकाओं को सुरक्षा और परिवहन की वजह से परेशानी होगी।
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55 वर्ष से अधिक आयु के शिक्षकों में डर का माहौल
विभाग की योजना के तहत 55 वर्ष से कम उम्र के शिक्षकों को प्राथमिकता से सांदीपनि स्कूलों में ट्रांसफर किया जाएगा। लेकिन 55 वर्ष से ऊपर के शिक्षकों को लंबी दूरी पर जाना पड़ सकता है। रिटायरमेंट प्लान कर चुके ये शिक्षक परिवार व घर की जिम्मेदारियों के कारण दूर जाने से हिचकिचा रहे हैं। इससे उनमें असुरक्षा की भावना बढ़ रही है।
दीपक पांडेय, संयुक्त संचालक, सांदीपनि सेल, लोक शिक्षण संचालनालय, मप्र ने कहा, “सांदीपनि स्कूलों में बेहतर शैक्षणिक व खेल सुविधाएं होंगी। यह विलय शिक्षा को मजबूत बनाने का कदम है, लेकिन ग्रामीण चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए परिवहन व्यवस्था पर काम चल रहा है।”
यह फैसला मध्य प्रदेश की शिक्षा व्यवस्था में बड़ा बदलाव लाएगा, लेकिन सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि ग्रामीण अभिभावकों की चिंताओं का समाधान कैसे होता है। विभाग का कहना है कि अगले सत्र से यह प्रक्रिया पूरी तरह लागू हो जाएगी। क्या यह सुधार वाकई फलित होगा, समय बताएगा।
मैं इंदर सिंह चौधरी वर्ष 2005 से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हूं। मैंने मास कम्यूनिकेशन में स्नातकोत्तर (M.A.) किया है। वर्ष 2007 से 2012 तक मैं दैनिक भास्कर, उज्जैन में कार्यरत रहा, जहाँ पत्रकारिता के विभिन्न पहलुओं का व्यावहारिक अनुभव प्राप्त किया।
वर्ष 2013 से 2023 तक मैंने अपना मीडिया हाउस ‘Hi Media’ संचालित किया, जो उज्जैन में एक विश्वसनीय नाम बना। डिजिटल पत्रकारिता के युग में, मैंने सितंबर 2023 में पुनः दैनिक भास्कर से जुड़ते हुए साथ ही https://mpnewsbrief.com/ नाम से एक न्यूज़ पोर्टल शुरू किया है। इस पोर्टल के माध्यम से मैं करेंट अफेयर्स, स्वास्थ्य, ज्योतिष, कृषि और धर्म जैसे विषयों पर सामग्री प्रकाशित करता हूं। फ़िलहाल मैं अकेले ही इस पोर्टल का संचालन कर रहा हूं, इसलिए सामग्री सीमित हो सकती है, लेकिन गुणवत्ता से कोई समझौता नहीं होता।










