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आचरण सुधारें, ग्रह स्वयं होंगे शांत: बिना मंत्र-रत्न के मिलेगा शुभ फल

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आचरण सुधारें, ग्रह स्वयं होंगे शांत: बिना मंत्र-रत्न के मिलेगा शुभ फल

Planets calm by good behavior | अनिष्ट ग्रहों की शांति के लिए केवल कठिन मंत्रों का जाप, महंगे रत्न धारण या विशेष टोटकों की ही आवश्यकता नहीं होती। आपके आचरण, व्यवहार और कर्म भी ग्रहों को अनुकूल बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। शास्त्रों और अनुभव दोनों बताते हैं कि व्यक्ति जैसा कर्म करता है, वैसा ही फल उसे समय आने पर प्राप्त होता है।

जिस प्रकार विज्ञान में कहा गया है कि पदार्थ कभी नष्ट नहीं होता, केवल उसका रूप बदलता है, उसी प्रकार किया गया कर्म भी कभी निष्फल नहीं जाता। पूर्व जन्मों और वर्तमान जीवन के कर्म ही ग्रहों की कृपा या कोप का कारण बनते हैं। यदि हम सीधे जीवों से, अर्थात व्यवहार और संबंधों से सुधार करें, तो ग्रह शीघ्र प्रसन्न हो सकते हैं।

धर्मशास्त्रों में मातृ देवो भव, पितृ देवो भव, गुरु देवो भव, अतिथि देवो भव जैसे सूत्र दिए गए हैं। केवल प्रणाम, सदाचार, वृद्धों की सेवा और परोपकार की भावना से आयु, विद्या, यश और बल की वृद्धि होती है। जीवों के प्रति करुणा और सम्मान रखने से कुंडली में रुष्ट ग्रहों की पीड़ा कम हो सकती है।

ज्योतिष शास्त्र के अनुसार हर ग्रह किसी न किसी रिश्ते और भाव का प्रतिनिधित्व करता है—

  • सूर्य: आत्मा और पिता
  • चंद्रमा: मन और माता
  • मंगल: पराक्रम और छोटे भाई-बहन
  • बुध: वाणी और मामा
  • बृहस्पति: ज्ञान, गुरु और बड़े भाई
  • शुक्र: ऐश्वर्य और जीवनसाथी
  • शनि: दुःख, सेवा और सेवक
  • राहु-केतु: समाज के वंचित, रोगी और दीन-हीन

यदि कोई ग्रह कष्ट दे रहा है, तो उसके प्रतिनिधि व्यक्ति या वर्ग के प्रति प्रेम, आदर और सहायता का भाव रखें। उदाहरण के लिए, जीवनसाथी को कष्ट देने से शुक्र निर्बल होता है और ऐश्वर्य घटता है, जबकि माता-पिता, गुरु और वृद्धों का सम्मान करने से कई ग्रह स्वतः शांत हो जाते हैं।

अनुभव यह भी बताता है कि यदि ग्रहों के प्रतिनिधि जीवों से संबंध खराब हों, तो पूजा-पाठ, दान और जप-तप भी अपेक्षित फल नहीं देते। इसलिए सच्चा उपाय है—सदाचार, सेवा और सही व्यवहार। जब आचरण शुद्ध होता है, तो ग्रह अपनी कोपता त्याग कर स्वयं शुभ फल देने लगते हैं।


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