महाकाल न्यूज़ के अंतर्गत उज्जैन स्थित महाकालेश्वर मंदिर में शिवनवरात्रि के दौरान मनाए जा रहे ‘हल्दी खेला’ को लेकर विवाद गहराता नजर आ रहा है। महाशिवरात्रि से पहले चल रहे महा शिवनवरात्रि उत्सव के दौरान महिलाओं द्वारा मंदिर परिसर में नाच-गाकर एक-दूसरे को हल्दी लगाने पर पुजारियों ने आपत्ति जताई है। उनका कहना है कि इस प्रकार का आयोजन सनातन परंपरा और शास्त्रों के अनुरूप नहीं है, इसलिए इस पर तत्काल रोक लगनी चाहिए।
शिवनवरात्रि में क्यों होता है विशेष पूजन
मान्यता के अनुसार, महाशिवरात्रि से पूर्व नौ दिनों तक भगवान महाकाल का विशेष शृंगार किया जाता है। इस दौरान प्रतिदिन सुबह मंदिर परिसर में कोटेश्वर भगवान का पूजन-अर्चन होता है। परंपरा के अनुसार यह काल शिव आराधना, साधना और संकल्प का माना जाता है, जिसे अत्यंत पवित्र भाव से संपन्न किया जाता है।
पूजन के बाद प्रतिदिन दर्शन के लिए आने वाली लगभग 50 से 100 महिलाएं भगवान शिव के विवाह का उत्सव मानकर भजन मंडली के साथ नाच-गान करती हैं और एक-दूसरे को हल्दी लगाती हैं। ढोल की थाप पर यह आयोजन बीते करीब 11 वर्षों से लगातार किया जा रहा है। महिलाओं का मानना है कि यह भगवान शिव के विवाह का प्रतीकात्मक उत्सव है।
पुजारियों की आपत्ति और शास्त्रों का हवाला
महाकाल मंदिर के पुजारी महेश शर्मा ने इस पर कड़ा विरोध जताते हुए कहा कि शिवनवरात्रि में केवल पूजा, आराधना और संकल्प की परंपरा है। उनके अनुसार शिव पुराण और अन्य शास्त्रों में न तो शिव विवाह का उल्लेख है और न ही हल्दी खेलने जैसी किसी परंपरा का। उन्होंने इसे धार्मिक मर्यादाओं के विपरीत बताते हुए मंदिर समिति से समय रहते प्रतिबंध लगाने की मांग की है।
महाकाल न्यूज़ के अनुसार, मंदिर प्रशासन को भी इस संबंध में शिकायतें प्राप्त हुई हैं। प्रशासनिक सूत्रों का कहना है कि मामले की गंभीरता को देखते हुए जल्द ही इस पर निर्णय लिया जा सकता है और आवश्यक होने पर आदेश जारी कर रोक लगाई जाएगी।
परंपरा और आस्था के बीच टकराव
मंदिर परिसर में कोटेश्वर भगवान को उबटन अर्पित करने और महाशिवरात्रि पर भगवान को दूल्हे के रूप में सजाने की पुरानी परंपरा रही है। इसी से प्रेरित होकर श्रद्धालुओं ने शिव विवाह की भावना से हल्दी खेलने की शुरुआत की। हालांकि अब यह परंपरा आस्था और शास्त्रीय मर्यादा के टकराव का विषय बन गई है।
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