इस समय पूरी दुनिया में ऊर्जा संकट की चर्चा तेज हो गई है और भारत भी इससे अछूता नहीं है। पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और ईरान के द्वारा होर्मुज जलडमरूमध्य बंद किए जाने के बाद हालात अचानक बदल गए हैं। कच्चे तेल की तुलना में सबसे ज्यादा चिंता रसोई गैस यानी एलपीजी को लेकर बढ़ी है क्योंकि इसका सीधा असर हर घर की रसोई पर पड़ता है। ऐसे में यह समझना बेहद जरूरी हो जाता है कि आखिर भारत में एलपीजी की कमी क्यों महसूस हो रही है और इसका समाधान क्या हो सकता है।
ईरान युद्ध के बीच भारत में एलपीजी की कमी क्यों हुई
भारत ने पिछले कुछ सालों में कच्चे तेल के आयात के लिए कई देशों से संबंध मजबूत किए हैं और अब लगभग 40 देशों से तेल मंगाया जाता है। इसके साथ ही भारत ने कच्चे तेल के बड़े भंडार भी बना रखे हैं जिससे संकट के समय कुछ राहत मिलती है।
लेकिन एलपीजी के मामले में स्थिति बिल्कुल अलग है। भारत अभी भी लगभग 90 प्रतिशत एलपीजी के लिए पश्चिम एशिया पर निर्भर है। यही वजह है कि जैसे ही होर्मुज जलडमरूमध्य बंद हुआ तो सप्लाई पर सीधा असर पड़ा और देश में गैस की कमी दिखने लगी।
भारत में एलपीजी का भंडारण कितना है
भारत ने विशाखापत्तनम मंगलुरु और पाडुर जैसे स्थानों पर कच्चे तेल के बड़े रणनीतिक भंडार बनाए हैं जिससे करीब 74 दिनों तक की जरूरत पूरी हो सकती है।
लेकिन एलपीजी के लिए ऐसी कोई मजबूत व्यवस्था नहीं है। देश में एलपीजी का भंडारण केवल लगभग 22 दिनों के आसपास माना जाता है और इसमें भी बॉटलिंग प्लांट का सीमित स्टॉक शामिल होता है। इसलिए अगर सप्लाई कुछ समय के लिए भी रुक जाए तो स्थिति जल्दी बिगड़ सकती है।
बिना भंडारण के कैसे चलती रही एलपीजी सप्लाई
भारत में एलपीजी का पूरा सिस्टम जस्ट इन टाइम मॉडल पर काम करता है। यानी जैसे ही विदेश से गैस आती है उसे सीधे उपभोक्ताओं तक पहुंचा दिया जाता है।
भारत अपनी जरूरत का 60 से 65 प्रतिशत एलपीजी आयात करता है और इसमें से 80 से 90 प्रतिशत पश्चिम एशिया से आता है। ऐसे में जब होर्मुज रास्ता बंद हुआ तो जहाजों की आवाजाही रुक गई बीमा खर्च बढ़ गया और देरी होने लगी जिससे संकट और गहरा गया।
कच्चे तेल पर असर कम और एलपीजी पर ज्यादा क्यों
कच्चे तेल के बड़े भंडार होने की वजह से उस पर तुरंत असर नहीं पड़ा लेकिन एलपीजी में ऐसा कोई बफर नहीं है। यही कारण है कि रसोई गैस की कमी जल्दी दिखाई देने लगी। सरकार ने हालात संभालने के लिए रिफाइनरियों को एलपीजी उत्पादन बढ़ाने के निर्देश भी दिए हैं ताकि कुछ राहत मिल सके।
एलपीजी का भंडारण बनाना इतना मुश्किल क्यों है
एलपीजी को स्टोर करना आसान नहीं है। यह प्रोपेन और ब्यूटेन गैस का मिश्रण होता है जिसे दबाव में रखना पड़ता है। इसके लिए विशेष टैंक और महंगी तकनीक की जरूरत होती है।
कच्चे तेल को जमीन के अंदर प्राकृतिक गुफाओं में रखा जा सकता है लेकिन एलपीजी के लिए ऐसा करना जोखिम भरा होता है क्योंकि दबाव के कारण संरचना को नुकसान पहुंच सकता है। यही वजह है कि भारत में अभी तक बड़े स्तर पर एलपीजी भंडारण विकसित नहीं हो पाया।
भारी लागत भी बनी बड़ी बाधा
एलपीजी के लिए रणनीतिक भंडार बनाना बहुत महंगा काम है। इसके लिए हाई प्रेशर टैंक पाइपलाइन और सुरक्षा सिस्टम की जरूरत होती है जिस पर अरबों डॉलर खर्च हो सकते हैं। इतना निवेश करने के बाद भी यह भंडार सीमित समय तक ही जरूरत पूरी कर पाता है।
अब भारत क्या कदम उठा सकता है
सरकार अब इस संकट को एक चेतावनी की तरह देख रही है और भविष्य के लिए नई रणनीति बना रही है। आने वाले समय में भारत पश्चिम एशिया पर निर्भरता कम कर अमेरिका नॉर्वे और अन्य देशों से आयात बढ़ाने की दिशा में काम कर सकता है।
इसके साथ ही अस्थायी भंडारण और फ्लोटिंग स्टोरेज जैसी योजनाओं पर भी विचार किया जा रहा है ताकि कम से कम 40 से 45 दिनों का बैकअप तैयार किया जा सके।
लंबे समय में एलपीजी के बड़े स्टोरेज बनाने नई तकनीक अपनाने और वैकल्पिक ईंधन जैसे बिजली आधारित कुकिंग पीएनजी और बायोगैस को बढ़ावा देने पर जोर दिया जाएगा ताकि भविष्य में ऐसा संकट दोबारा न आए।
आज का एलपीजी संकट सिर्फ एक अस्थायी समस्या नहीं बल्कि भारत की ऊर्जा सुरक्षा के लिए एक बड़ा संकेत है। अगर समय रहते भंडारण और आयात के स्रोतों में सुधार नहीं किया गया तो भविष्य में ऐसे संकट और भी गंभीर हो सकते हैं। लेकिन अच्छी बात यह है कि सरकार अब इस दिशा में तेजी से काम करने की तैयारी कर रही है जिससे आने वाले समय में स्थिति बेहतर हो सकती है।










