दशा माता पूजन विधि क्या है और इसके लाभ कौन-कौन से हैं?
Dashamata pujan vidhi | दशा माता का पूजन और व्रत हिंदू धर्म में एक प्राचीन और पवित्र परंपरा है, जो परिवार की सुख-शांति, समृद्धि और जीवन की बिगड़ी दशा को सुधारने के लिए की जाती है। यह पूजा मुख्य रूप से सुहागिन महिलाओं द्वारा की जाती है, जो अपने घर की खुशहाली और पति की लंबी उम्र की कामना करती हैं। दशा माता को देवी पार्वती का एक रूप माना जाता है, और उनकी कृपा से न केवल पारिवारिक समस्याओं का समाधान होता है, बल्कि ग्रहों की प्रतिकूल दशा से भी छुटकारा मिलता है। इस विस्तृत लेख में हम दशा माता पूजन की तिथि, विधि, कथा, लाभ और उन राज्यों के बारे में गहराई से जानेंगे, जहां यह पूजा प्रचलित है। Dashamata pujan vidhi
दशा माता व्रत कब किया जाता है?
दशा माता का व्रत और पूजन चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की दशमी तिथि को किया जाता है। हिंदू पंचांग के अनुसार, चैत्र मास वर्ष का पहला महीना होता है, जो आमतौर पर मार्च के अंत या अप्रैल की शुरुआत में शुरू होता है। चैत्र कृष्ण दशमी वह दिन है, जो होली के उत्सव के बाद और चैत्र नवरात्रि से पहले आता है। 2025 में चैत्र मास की शुरुआत 14 मार्च से होगी, और कृष्ण पक्ष की दशमी तिथि 24 मार्च 2025 को पड़ेगी। हालांकि, यह तारीख पंचांग के आधार पर थोड़ी भिन्न हो सकती है, इसलिए स्थानीय पंडित या पंचांग से इसकी पुष्टि करना उचित रहता है। यह तिथि इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसे जीवन में नई शुरुआत और दशा सुधार के लिए शुभ माना जाता है। इस दिन सुबह से ही व्रत और पूजा की तैयारियां शुरू हो जाती हैं, और महिलाएं इसे पूरे विधि-विधान के साथ संपन्न करती हैं। Dashamata pujan vidhi
दशा माता पूजन विधि: कैसे करें पूजा?
दशा माता की पूजा एक विधि-निष्ठ और श्रद्धापूर्ण प्रक्रिया है, जिसमें साफ-सफाई, संयम और भक्ति का विशेष महत्व है। यह पूजा पीपल के वृक्ष के साथ जुड़ी है, जिसे भगवान विष्णु का प्रतीक माना जाता है। नीचे पूजन की विस्तृत विधि दी गई है:
- संकल्प और तैयारी: चैत्र कृष्ण दशमी के दिन सुबह सूर्योदय से पहले उठें। नहाने के बाद स्वच्छ वस्त्र पहनें, खासकर लाल या पीले रंग के, जो शुभ माने जाते हैं। घर के पूजा स्थल को गंगाजल से शुद्ध करें और एक चौकी पर लाल या पीला कपड़ा बिछाएं। इसके बाद हाथ में जल, चावल और फूल लेकर संकल्प करें कि “मैं दशा माता का व्रत और पूजन अपने परिवार की सुख-शांति, समृद्धि और दशा सुधार के लिए कर रहा/रही हूं।” यह संकल्प मन को एकाग्र करता है और पूजा के उद्देश्य को स्पष्ट करता है।
- पूजा सामग्री: पूजा के लिए कई सामग्रियां चाहिए, जिनमें कच्चे सूत का डोरा (10 तारों वाला और उसमें 10 गांठें), हल्दी, कुमकुम, रोली, मौली (लाल धागा), सुपारी, अक्षत (चावल), घी का दीपक, धूप, अगरबत्ती, पीले फूल, नैवेद्य (मिठाई, फल या गुड़-चना), और पीपल का पत्ता या छोटी शाखा शामिल हैं। डोरे में 10 गांठें इसलिए बनाई जाती हैं, क्योंकि यह दशा माता के 10 रूपों का प्रतीक है। सभी सामग्रियों को एक थाली में सजाकर रखें।
- पीपल की पूजा: सुबह पीपल के पेड़ के पास जाएं। सबसे पहले पेड़ की जड़ में जल अर्पित करें और प्रार्थना करें कि “हे विष्णु स्वरूप पीपल, मेरे परिवार की रक्षा करें।” इसके बाद हल्दी और कुमकुम से पेड़ पर तिलक लगाएं। फिर कच्चे सूत के डोरे को पेड़ के तने के चारों ओर 10 बार लपेटें। हर बार लपेटते समय 10 परिक्रमा करें और मंत्र जाप करें, जैसे “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” या “ॐ पार्वत्यै नमः”। परिक्रमा के दौरान मन में दशा माता से अपनी मनोकामना कहें। पूजा के बाद पेड़ के नीचे दीपक जलाएं और धूप दिखाएं।
- कथा और पूजन: पीपल की छाया में बैठकर दशा माता की कथा सुनें (कथा नीचे दी गई है)। कथा सुनने के बाद डोरे को फूल, चंदन और कुमकुम से पूजें। इसे अपने गले में या दाहिने हाथ में बांध लें। मान्यता है कि यह डोरा नकारात्मक ऊर्जा से रक्षा करता है। इसे अगले साल की दशा माता पूजा तक पहनें। यदि साल भर न पहन सकें, तो वैशाख मास के शुक्ल पक्ष में इसे पीपल को अर्पित कर दें।
- भोजन और नियम: व्रत के दिन एक समय भोजन करें, जिसमें नमक का प्रयोग न करें। गेहूं की रोटी, साबूदाना, फल या गुड़ से बना भोजन करना चाहिए। दिन भर सात्विक विचार रखें और क्रोध या नकारात्मक बातों से बचें। पूजा के बाद घर के मुख्य द्वार और पूजा कक्ष में हल्दी-कुमकुम के छापे लगाएं, जो सौभाग्य का प्रतीक हैं। Dashamata pujan vidhi
दशा माता की कथा: राजा नल और दमयंती की कहानी
दशा माता की कथा श्रद्धालुओं को विश्वास और कर्म का महत्व सिखाती है। यह कहानी राजा नल और रानी दमयंती के जीवन से जुड़ी है। प्राचीन काल में नल निषाद देश के धर्मी और शक्तिशाली राजा थे। उनकी शादी विदर्भ की सुंदर राजकुमारी दमयंती से हुई। दोनों का जीवन सुखी था, लेकिन एक दिन दमयंती ने अनजाने में दशा माता का अपमान कर दिया। उसने घर में पड़े पुराने सूत के डोरे को बेकार समझकर फेंक दिया, जो दशा माता का प्रतीक था। इससे माता नाराज हो गईं और उनकी दशा बिगड़ गई।
शनि देव के प्रभाव से नल अपने भाई पुष्कर के साथ जुआ खेलने बैठे और हार गए। उन्होंने अपना राज्य, धन और महल सब खो दिया। दमयंती के साथ उन्हें जंगल में भटकना पड़ा। नल को कौवे ने उनका वस्त्र छीन लिया, और दमयंती को अकेले कई कष्ट सहने पड़े। एक दिन दमयंती को जंगल में एक संत मिले। संत ने कहा, “तुमने दशा माता का अपमान किया, इसलिए यह दुर्दशा हुई। चैत्र कृष्ण दशमी को पीपल की पूजा करो और व्रत रखो।” दमयंती ने संत की सलाह मानी। उसने पीपल पर सूत बांधा, 10 परिक्रमा की और माता से क्षमा मांगी। दशा माता प्रसन्न हुईं। जल्द ही नल को उनका राज्य वापस मिला, और दोनों फिर से सुखी जीवन जीने लगे। यह कथा सिखाती है कि दशा माता की पूजा से हर संकट दूर हो सकता है। Dashamata pujan vidhi
दशा माता पूजन के लाभ: क्या फायदे मिलते हैं?
- घर की दशा में सुधार: जिन परिवारों में आर्थिक तंगी, व्यापार में नुकसान या बार-बार धन हानि हो रही हो, वहां यह पूजा समृद्धि लाती है। यह घर की नकारात्मकता को दूर करती है।
- ग्रह दोषों से मुक्ति: ज्योतिष में शनि, राहु और केतु की खराब दशा से परेशानी होती है। दशा माता की पूजा इन ग्रहों के दुष्प्रभाव को कम करती है और जीवन में स्थिरता लाती है।
- सुख-शांति की प्राप्ति: परिवार में झगड़े, तनाव या अशांति हो, तो यह पूजा सकारात्मक ऊर्जा लाती है। डोरा पहनने से मन शांत रहता है।
- रोग मुक्ति: पीपल की पूजा से शारीरिक और मानसिक रोगों में राहत मिलती है। यह स्वास्थ्य को बेहतर करने में सहायक है।
- सौभाग्य और समृद्धि: सुहागिन महिलाएं इसे पति की लंबी उम्र और घर में धन-धान्य की वृद्धि के लिए करती हैं। यह पूजा सौभाग्य का वरदान देती है।
किन राज्यों में होती है दशा माता की पूजा?
- उत्तर प्रदेश: पूर्वांचल और अवध में यह पूजा बड़े उत्साह से होती है। महिलाएं समूह में कथा सुनती हैं और पीपल की पूजा करती हैं।
- बिहार: होली के बाद यह व्रत खासा लोकप्रिय है। यहां इसे दशा सुधार का उपाय माना जाता है।
- राजस्थान: ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाएं पारंपरिक गीत गाते हुए पूजा करती हैं। यह सांस्कृतिक परंपरा का हिस्सा है।
- गुजरात: “दशा माँ” के नाम से जानी जाने वाली यह पूजा स्थानीय रीति-रिवाजों के साथ की जाती है।
- महाराष्ट्र: ग्रामीण इलाकों में यह प्रचलित है और इसे देवी पूजा से जोड़ा जाता है।
- हरियाणा और पंजाब: कुछ क्षेत्रों में यह पूजा कम व्यापक रूप में की जाती है।
क्यों जरूरी है यह पूजा?
दशा माता का व्रत और पूजन श्रद्धा, विश्वास और कर्म का प्रतीक है। यह पूजा हमें सिखाती है कि सही विधि और भक्ति से जीवन की हर मुश्किल को दूर किया जा सकता है। आज 23 मार्च 2025 है, और चैत्र कृष्ण दशमी 3 अप्रैल 2025 को संभावित है। इसकी तैयारी के लिए यह लेख आपकी मदद करेगा। दशा माता की कृपा से आपका जीवन सुखमय हो! Dashamata pujan vidhi
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