डिजाइनर बच्चे: गाड़ियों-कपड़ों के बाद अब मनचाही शक्ल-सूरत वाले बच्चे!
Designer babies technology | आज के दौर में लोग कार से लेकर कपड़े तक सब कुछ अपनी पसंद का डिजाइनर चुनते हैं। अब विज्ञान ने एक कदम आगे बढ़ाते हुए माता-पिता को अपने होने वाले बच्चे का रंग-रूप, आंखों का रंग, चेहरे की बनावट और यहां तक कि बालों का स्टाइल भी चुनने की सुविधा दे दी है। इसे ‘डिजाइनर बेबी’ तकनीक कहा जा रहा है, जो सुनने में साइंस फिक्शन फिल्म जैसी लगती है, लेकिन हकीकत बन चुकी है।
क्या है ये तकनीक?
यह तकनीक IVF (टेस्ट ट्यूब बेबी) प्रक्रिया के दौरान काम करती है। वैज्ञानिक भ्रूण के डीएनए में बदलाव करते हैं। CRISPR नाम की जीन एडिटिंग तकनीक की मदद से डीएनए को ‘कैंची’ की तरह काटा जाता है और खराब जीन हटाकर मनचाहे गुणों वाले जीन जोड़े जाते हैं। इससे बच्चे की आंखें नीली, हरी या बड़ी बनाना, गोरा रंग देना या चेहरे की शक्ल बदलना तक संभव बताया जा रहा है। कुछ विशेषज्ञ तो दावा करते हैं कि भविष्य में बुद्धिमत्ता और व्यक्तित्व को भी इस तकनीक से प्रभावित किया जा सकता है।
पहली बार कब हुआ इस्तेमाल?
2018 में चीन के वैज्ञानिक हे जियानकुई ने इस तकनीक का इस्तेमाल कर दुनिया की पहली जीन-एडिटेड जुड़वां बच्चियों को जन्म दिया था। उन्होंने CCR5 जीन में बदलाव कर बच्चियों को HIV से बचाने का दावा किया। हालांकि, यह प्रयोग अंतरराष्ट्रीय स्तर पर गैरकानूनी और अनैतिक माना गया, जिसके बाद वैज्ञानिक को जेल भी हुई।
विवाद क्यों?
- कई विशेषज्ञ इसे ‘भगवान के साथ खेलना’ बता रहे हैं।
- नैतिक सवाल: क्या इंसान को अपनी अगली पीढ़ी को डिजाइन करने का अधिकार है?
- समाज में नई असमानता का डर – यह तकनीक बहुत महंगी होगी, सिर्फ अमीर लोग ही अपने बच्चे ‘डिजाइन’ करा पाएंगे।
- स्वास्थ्य जोखिम: गलत एडिटिंग से बच्चे में कैंसर या अन्य गंभीर बीमारियां हो सकती हैं।
कानूनी स्थिति क्या है?
दुनिया के ज्यादातर देशों में गैर-चिकित्सकीय कारणों (यानी सौंदर्य या मनचाही विशेषताएं) से जीन एडिटिंग पर पूरी तरह प्रतिबंध है। भारत में भी इस तरह के प्रयोग सख्ती से वर्जित हैं और नैतिक दिशानिर्देशों का उल्लंघन माना जाता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि यह तकनीक आनुवंशिक बीमारियों को रोकने में क्रांतिकारी साबित हो सकती है, लेकिन सौंदर्य या व्यक्तिगत पसंद के लिए इसका इस्तेमाल मानवता के लिए खतरा बन सकता है। क्या आप अपने बच्चे को ‘डिजाइन’ करना चाहेंगे? यह सवाल अब सिर्फ बहस का नहीं, बल्कि आने वाले समय की हकीकत बन सकता है।
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