भारतीय पंचांग में फाल्गुन मास का आध्यात्मिक महत्व अत्यंत विशिष्ट माना गया है। यह वर्ष का अंतिम मास है, जिसके बाद चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से नववर्ष का आरंभ होता है। शीत ऋतु के समापन और वसंत के पूर्ण प्रस्फुटन के बीच आने वाला यह मास प्रकृति, प्रेम, उत्सव और साधना का अनुपम संगम प्रस्तुत करता है। खेतों में लहलहाती रबी की फसल, आम्र-मंजरियों की सुगंध और कोयल की मधुर कूक वातावरण को जीवंत बना देती है। बाहरी उल्लास के साथ-साथ फाल्गुन मास का आध्यात्मिक महत्व हमें आत्ममंथन और नवआरंभ की प्रेरणा देता है।
धार्मिक आधार और महाशिवरात्रि का महत्व
फाल्गुन नाम फाल्गुनी नक्षत्र से जुड़ा है। धर्मग्रंथों में इस मास को पुण्यदायी बताया गया है। इस अवधि में स्नान, दान, जप और तप विशेष फलदायी माने जाते हैं। कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को महाशिवरात्रि मनाई जाती है, जो भगवान शिव और माता पार्वती के दिव्य मिलन का प्रतीक है। श्रद्धालु उपवास, रात्रि जागरण और अभिषेक कर शिवभक्ति में लीन होते हैं। इस पर्व के माध्यम से फाल्गुन मास का आध्यात्मिक महत्व आत्मसंयम और साधना का संदेश देता है।
होलिका दहन और होली का संदेश
फाल्गुन पूर्णिमा को होलिका दहन बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक है। भक्त प्रह्लाद की कथा हमें अडिग विश्वास की शक्ति का स्मरण कराती है। अगले दिन होली का उत्सव प्रेम और सामाजिक समरसता का संदेश देता है। ब्रज की लठमार होली और फूलों की होली इस पर्व को अद्वितीय बनाती हैं। इस प्रकार फाल्गुन मास का आध्यात्मिक महत्व केवल धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित नहीं, बल्कि जीवन में सकारात्मक परिवर्तन की प्रेरणा भी है।
आत्मजागरण और नवचेतना का काल
जैसे प्रकृति पुराने पत्तों को त्यागकर नए पल्लव धारण करती है, वैसे ही मनुष्य को भी नकारात्मकता छोड़कर नवचेतना अपनानी चाहिए। भजन, सत्संग और दान-पुण्य इस मास में विशेष फलदायी माने गए हैं। समग्र रूप से फाल्गुन मास का आध्यात्मिक महत्व हमें सिखाता है कि सच्चा उत्सव तभी संभव है जब भीतर भक्ति, बाहर प्रेम और जीवन में सद्भाव हो।
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