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गर्ल्स कॉलेज भर्ती घोटाला: 2 साल में 21 सीधी नियुक्तियां, 86 लोगों को बिना विज्ञापन के लगाई नौकरी

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गर्ल्स कॉलेज भर्ती घोटाला: 2 साल में 21 सीधी नियुक्तियां, 86 लोगों को बिना विज्ञापन के लगाई नौकरी

जनभागीदारी अध्यक्ष की बहन से लेकर प्रोफेसर के दामाद तक फायदा

Girls College Job Scam 2025 | 3 दिसंबर 2025 : मध्य प्रदेश के जबलपुर स्थित गर्ल्स डिग्री कॉलेज में भर्ती प्रक्रिया ने एक बड़ा घोटाला उजागर किया है। पिछले दो वर्षों में यहां 21 लोगों की सीधी नियुक्तियां हो चुकी हैं, जबकि कुल 86 कर्मचारियों को कॉन्ट्रैक्ट दर पर बिना किसी पारदर्शी प्रक्रिया के लगाया गया। न विज्ञापन, न आवेदन, न परीक्षा—सिर्फ रिश्तेदारी और बैकडोर एंट्री। जनभागीदारी समिति की अध्यक्ष मनीषा मिश्रा की बहन से लेकर प्रोफेसर डॉ. पद्मा आचार्य के दामाद तक, कई परिवारों को ‘फैमिली पैक’ की तरह नौकरियां बांटी गईं। इनमें से 29 अब स्थायी हो चुके हैं। प्राचार्य डॉ. आनंद तिवारी के कार्यकाल में यह ‘काला खेल’ फला-फूला, जिससे उच्च शिक्षा विभाग पर सवाल उठ रहे हैं।

पारदर्शिता का ‘जीरो सिस्टम’: कॉन्ट्रैक्ट से स्थायी तक का सफर

कॉलेज प्रशासन का कहना है कि ये भर्तियां ‘तात्कालिक जरूरतों’ के लिए की गईं, लेकिन रिकॉर्ड्स बयां करते हैं कि सब कुछ अनियमित था। SEDMAP एजेंसी के नाम पर कुछ पद भरे गए, लेकिन कोई दस्तावेजीकरण नहीं। अस्थाई कर्मचारियों को साल भर कॉन्ट्रैक्ट पर रखा जाता है, जो चुपके से स्थायी श्रेणी में आ जाते हैं। जॉइनिंग लेटर तक जारी नहीं होते, फिर भी ‘कलेक्टर दर’ पर वेतन बहता रहता है। यह न केवल सरकारी फंड का दुरुपयोग है, बल्कि छात्राओं की संस्था की साख को भी धब्बा लगा रहा। पूर्व छात्राएं और अभिभावक प्रदर्शन की तैयारी में हैं।

केस-1: अध्यक्ष की बहन की ‘पंच’ वाली एंट्री—काम का सवाल?

दो साल पहले जनभागीदारी समिति की अध्यक्ष बनीं मनीषा मिश्रा के कार्यकाल में उनकी बहन वंदना गुरु को अस्थाई कर्मचारी बनाया गया। अध्यक्ष बनने के ठीक एक साल बाद यह भर्ती हुई। वंदना को कॉन्ट्रैक्ट वेतन मिलता है, लेकिन सहकर्मी बताते हैं कि उन्हें सिर्फ पंच (अटेंडेंस) मार्कते देखा गया—कोई काम नहीं। सोमवार को भी वे गायब रहीं, लेकिन पंच समय पर हो गया। मिश्रा के दौर में ऐसी कई ‘स्पेशल’ नियुक्तियां हुईं, जो समिति के दुरुपयोग को इंगित करती हैं।

केस-2: प्रोफेसर के परिवार का ‘पैकेज’—दामाद से भतीजों तक

प्रोफेसर डॉ. पद्मा आचार्य (जनभागीदारी प्रभारी) की बहन के दामाद मुकेश कुमार शर्मा को आसानी से नौकरी मिली। इसी क्रम में इलेक्ट्रिशियन राजेश रैकवार की भर्ती के बाद उनके भतीजे सुनील और शैलेंद्र रैकवार भी कॉलेज में सेटल। राजेश-सुनील स्थायी, शैलेंद्र अस्थाई। वहीं, कंप्यूटर ऑपरेटर पुष्पेंद्र पाण्डेय ने खुद के बाद पत्नी आरती और भाई वीरेंद्र को भर्ती करा लिया। ये उदाहरण परिवारवाद के चरम को दिखाते हैं—एक सदस्य की एंट्री से चेन शुरू हो जाती है।

केस-3: परिवार का पूरा ‘कंट्रोल’—पति-पत्नी-बेटा सब सेट

प्यून ज्ञानी विश्वकर्मा की शुरुआती भर्ती के बाद पत्नी गौता को कुक पद मिला। फिर बेटे अरविंद को ऑपरेटर बना दिया। अब पूरा परिवार कॉन्ट्रैक्ट पर कॉलेज में है। स्टाफ के मुताबिक, ऐसे कई परिवार हैं जहां रिश्तेदारों की लाइन लगी रहती है। यह ‘फैमिली बिजनेस’ कॉलेज को नुकसान पहुंचा रहा, जहां वास्तविक योग्य उम्मीदवार बाहर रह जाते हैं।


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