हाल ही में हाई कोर्ट के एक फैसले ने कानूनी और सामाजिक दोनों ही स्तर पर बड़ी चर्चा छेड़ दी है। इस मामले में अदालत ने एक ऐसा निर्णय सुनाया है जो सहमति और संबंधों को लेकर नई बहस को जन्म दे रहा है। कोर्ट ने साफ कहा कि यदि लंबे समय तक शारीरिक संबंध बने रहें तो इसे सहमति का संकेत माना जा सकता है।
क्या था पूरा मामला
मामला उस समय शुरू हुआ जब एक महिला ने शिकायत दर्ज कराई कि वर्ष 2021 में उसकी दोस्ती एक व्यक्ति से हुई और बाद में उसने शादी का वादा कर उसके साथ संबंध बनाए। महिला का आरोप था कि जब वह गर्भवती हो गई तो आरोपी ने शादी से इनकार कर दिया और इसी कारण उसने पुलिस में दुष्कर्म का मामला दर्ज कराया।
अदालत ने क्या कहा
हाई कोर्ट की एकल पीठ ने अपने आदेश में कहा कि यदि दो वर्षों तक लगातार शारीरिक संबंध बने रहे तो यह दर्शाता है कि दोनों के बीच संबंध सहमति से थे। अदालत ने यह भी कहा कि यदि शादी का वादा पूरा नहीं हुआ तो सामान्य स्थिति में महिला को संबंध समाप्त कर देना चाहिए था लेकिन ऐसा नहीं हुआ।
व्यवहार से निकाला गया निष्कर्ष
अदालत ने पीड़िता के व्यवहार को ध्यान में रखते हुए यह निष्कर्ष निकाला कि वह पूरे समय अपनी इच्छा से इस संबंध में शामिल थी। इसी आधार पर कोर्ट ने आरोपी के खिलाफ दर्ज दुष्कर्म की एफआईआर को निरस्त कर दिया।
बचाव पक्ष की दलील
आवेदक की ओर से पेश वकीलों ने अदालत में यह दलील दी कि आरोप पूरी तरह गलत हैं और यह मामला सहमति से बने संबंधों का है। साथ ही यह भी कहा गया कि जिस घटना का जिक्र किया गया है वह विदेश में हुई थी इसलिए उसकी रिपोर्ट भारत में दर्ज नहीं कराई जा सकती।
फैसले के बाद उठे सवाल
इस फैसले के बाद समाज में कई तरह की प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। कुछ लोग इसे कानून की स्पष्टता मान रहे हैं तो कुछ लोग इसे संवेदनशील मामलों में अलग नजरिये से देख रहे हैं। यह मामला अब सहमति और वादे के बीच के अंतर को लेकर चर्चा का विषय बन गया है।
हाई कोर्ट का यह फैसला आने वाले समय में ऐसे मामलों के लिए एक महत्वपूर्ण उदाहरण बन सकता है। इससे यह भी साफ होता है कि अदालत हर मामले में परिस्थितियों और व्यवहार को ध्यान में रखकर निर्णय लेती है।









