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इंडिया एआई समिट 2026: दुनिया के 88 देश साथ, फिर भी क्यों उठे सवाल?

इंडिया एआई समिट 2026: दुनिया के 88 देश साथ, फिर भी क्यों उठे सवाल?
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इंडिया एआई समिट 2026 ने नई दिल्ली को वैश्विक आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस चर्चा के केंद्र में ला खड़ा किया है, लेकिन यह आगमन से अधिक एक शुरुआत साबित हुआ। 16 से 21 फरवरी तक भारत मंडपम में आयोजित इस छह दिवसीय आयोजन को दुनिया का सबसे बड़ा और ऐतिहासिक एआई सम्मेलन बताया गया। इसमें कई देशों के राष्ट्राध्यक्ष, वैश्विक टेक कंपनियों के प्रमुख और हजारों प्रतिनिधि शामिल हुए। यह भारत के लिए कूटनीतिक उपलब्धि जरूर थी, पर साथ ही इसने देश की तैयारियों और क्षमताओं की सीमाएं भी उजागर कर दीं।

कूटनीतिक सफलता और नई दिल्ली घोषणा

इंडिया एआई समिट 2026 की सबसे बड़ी उपलब्धि “नई दिल्ली घोषणा” रही, जिसे 88 देशों और अंतरराष्ट्रीय संगठनों का समर्थन मिला। इनमें अमेरिका, चीन, रूस, ब्रिटेन और फ्रांस जैसे बड़े देश शामिल थे। यह संख्या 2025 के पेरिस एआई एक्शन समिट से अधिक रही, जहां 61 देशों ने समर्थन दिया था। इस व्यापक समर्थन ने भारत को वैश्विक एआई गवर्नेंस में एक महत्वपूर्ण मंच प्रदान किया। हालांकि घोषणा में किए गए वादे स्वैच्छिक थे और इनके पालन के लिए कोई बाध्यकारी तंत्र नहीं था। अमेरिका के वरिष्ठ अधिकारी माइकल क्रात्सियोस ने स्पष्ट कहा कि वॉशिंगटन वैश्विक एआई गवर्नेंस को स्वीकार नहीं करता। इससे यह साफ हुआ कि राजनीतिक सहमति और व्यावहारिक क्रियान्वयन के बीच अभी दूरी बनी हुई है।

सुरक्षा से व्यापार तक बदलता फोकस

एआई समिट श्रृंखला की शुरुआत 2023 में ब्रिटेन के ब्लेचली पार्क से हुई थी, जहां मुख्य ध्यान एआई के जोखिमों और सुरक्षा पर था। सियोल समिट ने भी इस दिशा को आगे बढ़ाया। लेकिन 2025 के पेरिस सम्मेलन में फोकस सुरक्षा से हटकर निवेश और उद्योग विस्तार पर आ गया। इंडिया एआई समिट 2026 ने इसी रुझान को और मजबूत किया। दिल्ली का केंद्र बिंदु समावेशन, आर्थिक अवसर और निवेश रहा। कार्यक्रम में निवेश घोषणाएं, उत्पाद लॉन्च और सीईओ की मौजूदगी प्रमुख रही, जबकि जोखिम प्रबंधन और नियामक मानकों पर चर्चा सीमित रही। यह बदलाव दर्शाता है कि एआई के क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा और व्यापारिक हित फिलहाल प्राथमिकता बन चुके हैं।

लॉजिस्टिक चुनौतियां और आलोचना

हालांकि इंडिया एआई समिट 2026 ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ध्यान खींचा, लेकिन आयोजन की व्यवस्थाओं को लेकर आलोचना भी हुई। सुरक्षा कारणों से बार-बार हुए लॉकडाउन के चलते कई प्रतिनिधि भोजन और पानी के बिना फंसे रहे। दिल्ली के कई हिस्सों में वीआईपी मूवमेंट के कारण लंबा ट्रैफिक जाम लगा, जिससे आम नागरिक और प्रतिनिधि दोनों प्रभावित हुए। कुछ प्रतिभागियों को कार्यक्रम स्थल से परिवहन तक पहुंचने के लिए कई किलोमीटर पैदल चलना पड़ा। इसके अलावा, एक भारतीय विश्वविद्यालय द्वारा चीनी निर्मित रोबोट कुत्ते को स्वदेशी नवाचार बताने का मामला भी सामने आया, जिससे भारत की तकनीकी विश्वसनीयता पर सवाल उठे।

वैश्विक दिग्गजों की मौजूदगी और निवेश

इंडिया एआई समिट 2026 की बड़ी खासियत वैश्विक टेक दिग्गजों की उपस्थिति रही। अल्फाबेट के सीईओ सुंदर पिचाई, ओपनएआई के सैम ऑल्टमैन, एंथ्रोपिक के डारियो अमोदेई, गूगल डीपमाइंड के डेमिस हासाबिस और माइक्रोसॉफ्ट के ब्रैड स्मिथ सहित कई बड़े नाम शामिल हुए। फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों और संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस भी मौजूद रहे। केंद्रीय आईटी मंत्री अश्विनी वैष्णव के अनुसार, इस सम्मेलन में 250 अरब डॉलर से अधिक के इंफ्रास्ट्रक्चर निवेश और लगभग 20 अरब डॉलर के डीप टेक वेंचर कैपिटल निवेश की प्रतिबद्धताएं मिलीं। ओपनएआई और एएमडी ने टाटा समूह के साथ साझेदारी की घोषणा की, जो भारत के लिए सकारात्मक संकेत है।

घरेलू एआई प्रयास और भविष्य की राह

इंडिया एआई समिट 2026 में घरेलू स्तर पर भी महत्वपूर्ण घोषणाएं हुईं। स्टार्टअप सर्वम एआई ने 30 अरब और 105 अरब पैरामीटर वाले मॉडलों के विकास की घोषणा की, जो भारतीय भाषाओं को ध्यान में रखकर बनाए गए हैं। यह कदम भारत की एआई क्षमताओं को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण है। हालांकि इसे वैश्विक स्तर की बड़ी क्रांति नहीं माना गया, लेकिन यह संकेत जरूर है कि भारत एआई के विभिन्न स्तरों पर अपनी उपस्थिति दर्ज करा सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि एआई के प्रसार और उपयोग के क्षेत्र में भारत की बड़ी भूमिका हो सकती है, खासकर जब चीन का बाजार पश्चिमी कंपनियों के लिए सीमित है।

निष्कर्ष:

कुल मिलाकर, इंडिया एआई समिट 2026 ने भारत को वैश्विक एआई विमर्श में प्रमुख स्थान दिलाया है। यह आयोजन कूटनीतिक और प्रतीकात्मक रूप से सफल रहा, लेकिन इससे यह भी स्पष्ट हुआ कि देश को बुनियादी ढांचे, समन्वय और क्रियान्वयन क्षमता में अभी लंबा सफर तय करना है। दिल्ली ने एक मजबूत शुरुआत जरूर की है, पर एआई की वैश्विक दौड़ में वास्तविक नेतृत्व हासिल करने के लिए निरंतर प्रयास और ठोस नीतिगत कदम आवश्यक होंगे।

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