रुपया 90 के पार, RBI की सतर्क रणनीति: गिरावट रोकने के लिए क्या कर रहा है रिजर्व बैंक?
डॉलर vs रुपया: 2025 में 4.9% की गिरावट, अमेरिकी टैरिफ और ट्रेड डेफिसिट से दबाव; RBI ने अपनाया संतुलित इंटरवेंशन और स्वैप का रास्ता
Indian Rupee hits 90 vs Dollar | भारतीय रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले ऐतिहासिक निचले स्तर पर पहुंच गया है। दिसंबर 2025 में रुपया 90 के महत्वपूर्ण स्तर को पार कर चुका है, जो 2025 में अब तक की सबसे बड़ी गिरावट को दर्शाता है। साल भर में रुपया करीब 4.9% कमजोर हुआ है, जिससे यह दुनिया की प्रमुख मुद्राओं में तीसरा सबसे खराब प्रदर्शन करने वाला बन गया है। मजबूत GDP ग्रोथ के बावजूद, ट्रेड डेफिसिट का बढ़ना, विदेशी निवेशकों की बिकवाली और अमेरिका द्वारा भारतीय आयात पर 50% टैरिफ लगाना मुख्य कारण हैं। भारत-अमेरिका ट्रेड डील में देरी ने भी रुपये पर अतिरिक्त दबाव डाला है।
यह स्थिति RBI गवर्नर संजय मल्होत्रा के लिए बड़ी चुनौती है, जो पुरानी वित्तीय संकटों से बचते हुए रुपये की फ्लेक्सिबिलिटी और मार्केट स्टेबिलिटी के बीच संतुलन बनाए रखने की कोशिश कर रहे हैं।
RBI क्या कर रहा है?
ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के अनुसार, गवर्नर संजय मल्होत्रा स्पेक्युलेशन को रोकने पर फोकस कर रहे हैं और पूर्व गवर्नर के आक्रामक इंटरवेंशन से बच रहे हैं। ज्यादा इंटरवेंशन से रिजर्व कम हो सकते हैं और लिक्विडिटी प्रभावित हो सकती है, जबकि कम इंटरवेंशन से गिरावट तेज हो सकती है।
कॉर्नेल यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर ईश्वर प्रसाद के मुताबिक, मल्होत्रा “हवा के खिलाफ झुकने” की रणनीति अपनाए हुए हैं—यानी मार्केट दबाव का पूरी तरह विरोध नहीं, बल्कि शॉर्ट-टर्म वोलैटिलिटी को सीमित करने के लिए सीमित इंटरवेंशन।
RBI के साउथ मुंबई हेडक्वार्टर में रोज मार्केट खुलने से पहले इंटरवेंशन स्ट्रेटेजी पर चर्चा होती है। फाइनेंशियल मार्केट्स कमेटी दबाव का आकलन करती है और जरूरत पर दिन में कई मीटिंग्स होती हैं। अंतिम फैसला गवर्नर का होता है। निर्देश बड़े सरकारी बैंकों के सीनियर डीलर्स को भेजे जाते हैं, जो इसे लागू करते हैं।
प्राइवेट बैंक सहित इंटरवेंशन में शामिल संस्थानों को अपनी पोजीशन बनाने से रोका जाता है। ट्रांजैक्शन पर कम फीस मिलती है, जो सिर्फ ऑपरेशनल कॉस्ट कवर करती है।
RBI का बड़ा फैसला: डॉलर-रुपया स्वैप नीलामी
RBI ने 16 दिसंबर 2025 को 5 बिलियन डॉलर (करीब 45,000 करोड़ रुपये) की 36 महीने की डॉलर-रुपया बाय-सेल स्वैप नीलामी का ऐलान किया है। इसमें बैंक RBI को डॉलर बेचेंगे और रुपये लेंगे, जबकि 3 साल बाद उलटा होगा।
एक्सपर्ट्स के अनुसार, इससे बैंकिंग सिस्टम में करीब 45,000 करोड़ रुपये की लिक्विडिटी आएगी, जो ओवरनाइट रेट्स कम करेगी और हाल की रेपो रेट कटौती को सपोर्ट करेगी। रुपये की उपलब्धता बढ़ने से दबाव कम होगा, बिना रिजर्व्स को स्थायी रूप से घटाए।
करेंसी इंटरवेंशन का पुराना रिश्ता
भारत में करेंसी इंटरवेंशन का इतिहास लंबा है। 1991 के बैलेंस ऑफ पेमेंट संकट में गोल्ड रिजर्व इस्तेमाल हुआ था। 2013 में US फेड की टेपरिंग से दबाव पड़ा, जिसके बाद रिजर्व्स मजबूत करने पर फोकस हुआ। 28 नवंबर 2025 तक भारत के फॉरेन एक्सचेंज रिजर्व्स 686 बिलियन डॉलर तक पहुंचे, जिसमें 557 बिलियन डॉलर करेंसी और 106 बिलियन गोल्ड शामिल है।
RBI की मौजूदा रणनीति अनप्रेडिक्टेबल इंटरवेंशन और लिक्विडिटी मैनेजमेंट पर आधारित है, जो स्पेक्युलेशन रोकते हुए रुपये को स्थिर रखने का प्रयास कर रही है। हालांकि, ट्रेड इंबैलेंस और ग्लोबल फैक्टर्स से चुनौतियां बनी हुई हैं।
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