मलेशिया में नया शरिया कानून: जुमे की नमाज छोड़ने पर सजा और भारत के लिए सबक

मलेशिया में नया शरिया कानून: जुमे की नमाज छोड़ने पर सजा और भारत के लिए सबक

Malaysias Strict Sharia Law | मलेशिया के तेरेंगानु राज्य में लागू हुए नए शरिया कानून ने जुमे की नमाज को अनिवार्य करने के लिए कठोर नियम पेश किए हैं। इस कानून के तहत, बिना वैध कारण के जुमे की नमाज छोड़ने वाले मुस्लिम पुरुषों को 2 साल तक की जेल और 3,000 रिंगित (लगभग ₹61,780) का जुर्माना हो सकता है। यह कानून धार्मिक अनुशासन लागू करने की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है, लेकिन इसने मलेशिया और वैश्विक स्तर पर तीखी बहस छेड़ दी है। भारत, जो एक धर्मनिरपेक्ष और विविधतापूर्ण देश है, के लिए यह घटना कई महत्वपूर्ण सबक देती है। आइए इस कानून के विवरण, इसके प्रभाव, और भारत के लिए निहितार्थों पर विस्तार से नजर डालें। Malaysias Strict Sharia Law

मलेशिया के तेरेंगानु राज्य ने शरिया क्रिमिनल ऑफेंसेज (तकजीर) एनैक्टमेंट 2016 में संशोधन के तहत एक सख्त कानून लागू किया। इसके अनुसार, कोई भी मुस्लिम पुरुष जो बिना वैध कारण के जुमे की नमाज छोड़ता है, उसे 2 साल तक की जेल, 3,000 रिंगित (लगभग ₹61,780) का जुर्माना, या दोनों सजा भुगतनी पड़ सकती है। पहले यह नियम केवल उन लोगों पर लागू होता था जो लगातार तीन जुमे की नमाज छोड़ते थे, लेकिन अब एक बार भी नमाज न पढ़ने पर कार्रवाई होगी।

तेरेंगानु के सूचना, उपदेश और शरिया सशक्तिकरण मंत्री मुहम्मद खलील अब्दुल हादी ने कहा, “जुमे की नमाज सिर्फ एक धार्मिक प्रतीक नहीं, बल्कि अल्लाह के प्रति आज्ञाकारिता का प्रतीक है। यह कानून मुसलमानों को उनकी धार्मिक जिम्मेदारी याद दिलाने के लिए है।” उन्होंने यह भी बताया कि सजा अंतिम उपाय होगी और पहले लोगों को जागरूकता के जरिए प्रोत्साहित किया जाएगा। मस्जिदों के बाहर बैनर लगाए जाएंगे ताकि लोगों को नमाज की अनिवार्यता की याद दिलाई जाए।

तेरेंगानु, जहां 99% से अधिक आबादी मलय मुस्लिम है, पैन-मलेशियाई इस्लामिक पार्टी (PAS) के शासन में है। 2022 के विधानसभा चुनाव में PAS ने तेरेंगानु की सभी 32 सीटें जीतकर पूर्ण प्रभुत्व हासिल किया। यह कानून PAS की रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है, जिसके तहत वह धार्मिक कट्टरता को बढ़ावा देकर अपनी राजनीतिक पकड़ मजबूत करना चाहती है। मलेशिया में अगले दो वर्षों में आम चुनाव होने हैं, और यह कदम PAS की धार्मिक छवि को और मजबूत कर सकता है।

मलेशिया में इस्लाम राजकीय धर्म है, लेकिन देश की संवैधानिक संरचना धर्मनिरपेक्ष सिद्धांतों पर आधारित है। तेरेंगानु और केलांतन जैसे राज्यों में PAS ने पहले भी सख्त शरिया नियम लागू करने की कोशिश की है, जैसे हुदूद (इस्लामी दंड संहिता) जिसमें चोरी के लिए हाथ काटना और व्यभिचार के लिए पथराव शामिल है। हालांकि, संघीय सरकार ने ऐसी सजा को लागू करने की अनुमति नहीं दी।

इस कानून ने मलेशिया में तीखी बहस छेड़ दी है। मलेशियाई वकील अजीरा अजीज ने इसे कुरान की शिक्षा “धर्म में कोई बाध्यता नहीं” के खिलाफ बताया। उन्होंने कहा, “जुमे की नमाज अनिवार्य है, लेकिन इसे अपराध बनाना जरूरी नहीं। जागरूकता अभियान और शिक्षा पर्याप्त हैं।” कई सोशल मीडिया उपयोगकर्ताओं ने इसे “तालिबानीकरण” की ओर कदम बताया और चेतावनी दी कि इससे धार्मिक कट्टरता बढ़ेगी। एक यूजर, अहमद अजहर, ने लिखा, “हमें सभी मलेशियाई लोगों की चिंता की आवाज चाहिए, वरना हम जल्द ही तालिबान जैसे हो जाएंगे।”

whatsapp group link

ग्रुप जॉइन करने के लिए क्लिक करें: https://whatsapp.com/channel/0029ValRqro5K3zMVUrxrl28

कुछ लोगों ने तर्क दिया कि यह कानून व्यक्तिगत आस्था को जबरदस्ती लागू करता है, जो सच्ची धार्मिकता को कमजोर करता है। एक ऑनलाइन टिप्पणी में कहा गया, “धार्मिकता दिल से आनी चाहिए, न कि सजा के डर से।” गैर-मुस्लिम यूजर्स ने भी सावधानी बरतने की सलाह दी, जैसे केनी टैन ने कहा, “यह मुस्लिमों का मामला है, गैर-मुस्लिमों को इसमें नहीं बोलना चाहिए।”

प्रधानमंत्री अनवर इब्राहिम के कार्यकाल में मलेशिया में धार्मिक रूढ़िवाद बढ़ने की बात कही जा रही है। हाल ही में एक प्राचीन मंदिर को तोड़कर उसकी जगह मस्जिद बनाने की घटना ने भी विवाद को जन्म दिया था, जिसका उद्घाटन अनवर ने किया। यह कानून मलेशिया के धीरे-धीरे धार्मिक कट्टरपंथ की ओर बढ़ने का प्रतीक माना जा रहा है। तेरेंगानु में पहले भी खलवत (गैर-वैवाहिक जोड़ों की नजदीकी) जैसे छोटे अपराधों के लिए सार्वजनिक कोड़े मारने की सजा लागू की गई है।

मलेशिया में शरिया और सिविल कानूनों का दोहरा ढांचा है। शरिया कानून मुस्लिमों के लिए पारिवारिक और धार्मिक मामलों में लागू होता है, लेकिन तेरेंगानु जैसे राज्यों में इसका दायरा बढ़ रहा है। यह कदम मलेशिया की बहुलतावादी संस्कृति पर सवाल उठाता है, जहां 63.5% आबादी मुस्लिम, 18.7% बौद्ध, 9.1% ईसाई, और 6.1% हिंदू हैं।

भारत के लिए सबक

भारत, जो एक धर्मनिरपेक्ष और विविधतापूर्ण देश है, मलेशिया के इस कानून से कई सबक ले सकता है:

  1. धर्मनिरपेक्षता की रक्षा: भारत का संविधान सभी धर्मों को समान सम्मान देता है और धार्मिक स्वतंत्रता की गारंटी देता है। तेरेंगानु का कानून दिखाता है कि धार्मिक कट्टरता को कानूनी रूप देने से सामाजिक तनाव बढ़ सकता है। भारत को अपनी धर्मनिरपेक्ष नीतियों को मजबूत करना चाहिए ताकि किसी भी समुदाय पर जबरदस्ती धार्मिक नियम न थोपे जाएं।

  2. जागरूकता बनाम सजा: धार्मिक प्रथाओं को बढ़ावा देने के लिए जागरूकता और शिक्षा अधिक प्रभावी हैं। भारत में विभिन्न समुदायों के बीच धार्मिक सहिष्णुता को बढ़ावा देने के लिए संवाद और सांस्कृतिक कार्यक्रमों पर जोर देना चाहिए, न कि दंडात्मक उपायों पर।

  3. चुनावी राजनीति और धर्म: PAS की रणनीति दिखाती है कि धार्मिक मुद्दों का उपयोग चुनावी लाभ के लिए किया जा सकता है। भारत में भी कुछ दल धार्मिक भावनाओं को भुनाने की कोशिश करते हैं। नेताओं और नागरिकों को सतर्क रहना चाहिए ताकि धर्म का दुरुपयोग राजनीतिक हितों के लिए न हो।

  4. महिला और अल्पसंख्यक सुरक्षा: मलेशिया में गैर-मुस्लिमों को शरिया अदालतों में कोई अधिकार नहीं है, जिससे उनके हित प्रभावित होते हैं। भारत में सभी समुदायों के लिए समान कानूनी अधिकार सुनिश्चित करना जरूरी है ताकि कोई भी समूह उपेक्षित न हो।

तेरेंगानु का नया शरिया कानून धार्मिक अनुशासन लागू करने की कोशिश है, लेकिन यह धार्मिक स्वतंत्रता और व्यक्तिगत अधिकारों पर सवाल उठाता है। भारत जैसे धर्मनिरपेक्ष देश के लिए यह एक चेतावनी है कि धार्मिक कट्टरता और सख्त कानून सामाजिक सौहार्द को नुकसान पहुंचा सकते हैं। भारत को अपनी धर्मनिरपेक्षता, समावेशी नीतियों, और संवैधानिक मूल्यों को मजबूत करने पर ध्यान देना चाहिए ताकि सभी समुदायों के बीच संतुलन और शांति बनी रहे। Malaysias Strict Sharia Law


Leave a Comment

अहान पांडे कौन हैं? साउथ के मशहूर विलेन कोटा श्रीनिवास का निधन Kota Srinivasa Rao death news शर्मनाक जांच! ठाणे के स्कूल में छात्राओं के कपड़े उतरवाए गए अर्चिता फुकन और Kendra Lust की वायरल तस्‍वीरें! जानिए Babydoll Archi की हैरान कर देने वाली कहानी बाइक और स्कूटर चलाने वालों के लिए बड़ी खबर! Anti-Lock Braking System लो हो गया पंचायत सीजन 4 रिलीज, यहां देखें