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मोदी सरकार पर अपनों की चोट, हरिसिंह धनगर का बड़ा सवाल

मोदी सरकार पर अपनों की चोट, हरिसिंह धनगर का बड़ा सवाल
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हरिसिंह धनगर का कहना है कि आज के समय में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को केवल विपक्ष ही नहीं, बल्कि अपने ही विचारधारा के लोगों की आलोचना का भी सामना करना पड़ रहा है। जिन लोगों ने कभी कांग्रेस शासन के हिंदू दमन, मुस्लिम तुष्टीकरण, भ्रष्टाचार और कुशासन के खिलाफ देश को जागरूक किया, उन्हीं प्रयासों के परिणामस्वरूप वर्ष 2014 में देश ने व्यवस्था परिवर्तन देखा। राम मंदिर निर्माण, अनुच्छेद 370 की समाप्ति, हरे और लाल आतंकवाद पर प्रहार, आर्थिक मजबूती, विकास की तेज रफ्तार और सैकड़ों जनकल्याणकारी योजनाओं के माध्यम से वंचित और पिछड़े वर्गों के उत्थान का जो कार्य हुआ, वह संतोषजनक रहा है।

आलोचना का अधिकार और उसकी सीमा

इसके बावजूद आज वही राष्ट्रवादी और हिंदुत्व के झंडाबरदार लोग वर्तमान शासन व्यवस्था की तीखी आलोचना करते नजर आ रहे हैं। सवाल यह उठता है कि यदि यह सरकार नहीं, तो देश के लिए विकल्प कौन है—राहुल गांधी, ममता बनर्जी, अखिलेश यादव या असदुद्दीन ओवैसी? संभव है कि वर्तमान शासन में कुछ निर्णय अपेक्षाओं के अनुरूप न हों, लेकिन लोकतंत्र में विरोध और सुधार के लिए दबाव बनाने के कई रास्ते खुले हैं।

राष्ट्रहित बनाम व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा

हरिसिंह धनगर का तर्क है कि दूध देने वाली गाय लात मार दे तो उसका अर्थ यह नहीं कि उसकी गर्दन काट दी जाए। कुछ असहमतियों के कारण कामधेनु जैसी सरकार और सुशासन देने वाले नेता को खो देना समझदारी नहीं होगी। उन्होंने यह भी कहा कि कई तथाकथित विद्वान अपनी व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाएं पूरी न होने पर शासन के विरोध में सक्रिय हो जाते हैं और जाति, वर्ग व क्षेत्र की अस्मिता के नाम पर जनता को भ्रमित करते हैं।

स्वतंत्र सोच की आवश्यकता

उनका मानना है कि सरकार विरोध का नेतृत्व अक्सर वे लोग कर रहे हैं, जिनके निजी स्वार्थ जुड़े हैं या जिन्हें विपक्ष से समर्थन मिलता है। इसलिए मीडिया और सोशल मीडिया पर आने वाले हर विचार को बिना सोचे-समझे स्वीकार करने के बजाय अपनी बुद्धि और आत्मचिंतन से परखना राष्ट्र और समाज दोनों के हित में है।

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