MRP से अधिक कीमत पर शराब बेचने वालों पर हाई कोर्ट का नोटिस जारी

MRP से अधिक कीमत पर शराब बेचने वालों पर हाई कोर्ट का नोटिस जारी

MP News | मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने शराब की बिक्री में अधिकतम खुदरा मूल्य (MRP) से अधिक कीमत वसूलने की शिकायतों पर एक जनहित याचिका (PIL) के आधार पर महत्वपूर्ण कदम उठाया है। कोर्ट ने इस मामले में आबकारी विभाग और अन्य संबंधित अधिकारियों को नोटिस जारी कर चार सप्ताह के भीतर जवाब मांगा है। याचिका में आरोप लगाया गया है कि शराब विक्रेता आबकारी कर्मचारियों की मिलीभगत से एमआरपी से अधिक कीमत पर शराब बेच रहे हैं, जिससे न केवल उपभोक्ताओं को आर्थिक नुकसान हो रहा है, बल्कि राज्य सरकार को भी राजस्व की हानि हो रही है। यह मामला न केवल उपभोक्ता अधिकारों के उल्लंघन को उजागर करता है, बल्कि शराब व्यापार में पारदर्शिता और नियमन की कमी को भी रेखांकित करता है। आइए, इस मामले को विस्तार से समझते हैं और इसके विभिन्न पहलुओं पर प्रकाश डालते हैं। MP News


याचिका का आधार और आरोप

जबलपुर के वकील दीपांशु साहू ने मध्य प्रदेश हाई कोर्ट में यह जनहित याचिका दायर की है। याचिका में कहा गया है कि राज्य भर में शराब की दुकानों पर बोतलों पर अंकित एमआरपी से कहीं अधिक कीमत वसूली जा रही है। यह प्रथा न केवल उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 और लीगल मेट्रोलॉजी एक्ट, 2009 का उल्लंघन है, बल्कि आबकारी नीति के तहत निर्धारित नियमों के भी खिलाफ है। याचिकाकर्ता का कहना है कि यह अनैतिक व्यापार प्रथा आबकारी विभाग के कर्मचारियों की मौन सहमति और मिलीभगत के बिना संभव नहीं है। MP News

याचिका में यह भी उल्लेख किया गया है कि विक्रेताओं द्वारा उपभोक्ताओं से वसूली गई अतिरिक्त राशि पर कोई कर (जैसे वैट या जीएसटी) नहीं चुकाया जाता, जिससे राज्य सरकार को भारी राजस्व हानि होती है। इसके अलावा, उपभोक्ताओं को उनकी जेब से अधिक पैसा खर्च करना पड़ता है, जो उनके अधिकारों का स्पष्ट उल्लंघन है। याचिकाकर्ता ने इस प्रथा को रोकने के लिए सख्त कार्रवाई की मांग की है, जिसमें शराब की कीमतों की पारदर्शिता सुनिश्चित करने और दोषी विक्रेताओं के खिलाफ कठोर दंडात्मक कार्रवाई शामिल है। MP News


हाई कोर्ट की कार्रवाई

मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की खंडपीठ, जिसमें मुख्य न्यायाधीश संजीव सचदेवा और न्यायमूर्ति विनय सराफ शामिल हैं, ने इस याचिका पर प्रारंभिक सुनवाई के बाद मामले की गंभीरता को स्वीकार किया। कोर्ट ने आबकारी आयुक्त, राज्य के वाणिज्यिक कर आयुक्त, जिला आबकारी अधिकारी, और जबलपुर के कलेक्टर को नोटिस जारी कर चार सप्ताह के भीतर जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया। कोर्ट ने यह भी संकेत दिया कि वह इस मामले में उपभोक्ता अधिकारों और राज्य के राजस्व हितों की रक्षा के लिए आवश्यक कदम उठाने को तैयार है।

हाई कोर्ट का यह कदम शराब व्यापार में अनियमितताओं और भ्रष्टाचार के खिलाफ एक मजबूत संदेश देता है। यह मामला न केवल मध्य प्रदेश बल्कि पूरे देश में शराब की बिक्री से जुड़े नियमों और उनकी पालना पर सवाल उठाता है।


उपभोक्ताओं पर प्रभाव

शराब की अधिक कीमत पर बिक्री का सबसे बड़ा असर आम उपभोक्ताओं पर पड़ता है। एमआरपी एक ऐसा मूल्य है, जो उत्पाद की पैकेजिंग पर अंकित होता है और इसमें उत्पादन, परिवहन, और सभी कर शामिल होते हैं। लीगल मेट्रोलॉजी एक्ट, 2009 के तहत, किसी भी उत्पाद को एमआरपी से अधिक कीमत पर बेचना गैरकानूनी है। फिर भी, मध्य प्रदेश में कई शराब विक्रेता इस नियम की खुलेआम अवहेलना कर रहे हैं।

उदाहरण के लिए, यदि किसी शराब की बोतल का एमआरपी 500 रुपये है, लेकिन विक्रेता उसका 550 रुपये वसूलता है, तो उपभोक्ता को 50 रुपये का अतिरिक्त नुकसान होता है। यह राशि छोटी लग सकती है, लेकिन जब लाखों उपभोक्ताओं की बात आती है, तो यह नुकसान करोड़ों रुपये में पहुंच जाता है। इसके अलावा, उपभोक्ताओं को इस अतिरिक्त राशि का कोई रसीद नहीं दिया जाता, जिससे उनकी शिकायत दर्ज करने की क्षमता सीमित हो जाती है।

याचिकाकर्ता ने यह भी बताया कि जब उपभोक्ता इस तरह की अनियमितताओं की शिकायत करते हैं, तो आबकारी कर्मचारी अक्सर विक्रेता से केवल एक माफी पत्र लिखवाकर मामले को रफा-दफा कर देते हैं। यह प्रथा न केवल उपभोक्ता विश्वास को कम करती है, बल्कि आबकारी विभाग की विश्वसनीयता पर भी सवाल उठाती है।


राज्य सरकार को राजस्व हानि

शराब की बिक्री मध्य प्रदेश सरकार के लिए राजस्व का एक प्रमुख स्रोत है। आबकारी विभाग राज्य का दूसरा सबसे बड़ा राजस्व अर्जन करने वाला विभाग है। हालांकि, एमआरपी से अधिक कीमत पर शराब बेचने की प्रथा से सरकार को भारी नुकसान हो रहा है। याचिका में दावा किया गया है कि उपभोक्ताओं से वसूली गई अतिरिक्त राशि पर कोई वैट या जीएसटी नहीं चुकाया जाता, जिससे यह राशि पूरी तरह से काला धन बन जाती है।

उदाहरण के लिए, यदि एक शराब विक्रेता प्रतिदिन 10,000 रुपये की अतिरिक्त वसूली करता है, और मध्य प्रदेश में हजारों ऐसी दुकानें हैं, तो यह राशि सालाना अरबों रुपये तक पहुंच सकती है। यह न केवल सरकार के राजस्व को प्रभावित करता है, बल्कि शराब व्यापार में अवैध गतिविधियों को भी बढ़ावा देता है। याचिकाकर्ता ने मांग की है कि सरकार शराब की बिक्री में पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए डिजिटल ट्रैकिंग सिस्टम लागू करे, जैसा कि कुछ अन्य राज्यों में किया गया है।


आबकारी विभाग की भूमिका पर सवाल

याचिका में आबकारी विभाग पर गंभीर आरोप लगाए गए हैं। याचिकाकर्ता का कहना है कि विक्रेता बिना आबकारी कर्मचारियों की मिलीभगत के एमआरपी से अधिक कीमत पर शराब नहीं बेच सकते। यह आरोप इस बात की ओर इशारा करता है कि विभाग के कुछ कर्मचारी इस अनैतिक प्रथा में शामिल हो सकते हैं।

आबकारी विभाग का दायित्व है कि वह शराब की बिक्री को नियंत्रित करे और यह सुनिश्चित करे कि उपभोक्ताओं को उचित मूल्य पर शराब मिले। हालांकि, याचिका में कहा गया है कि विभाग इस जिम्मेदारी को निभाने में विफल रहा है। इसके अलावा, शिकायतों के निपटारे में भी विभाग की ओर से उदासीनता बरती जाती है। यह स्थिति न केवल उपभोक्ताओं के लिए हानिकारक है, बल्कि सरकार की छवि को भी धूमिल करती है।


अन्य राज्यों में समान मामले

मध्य प्रदेश में शराब की अधिक कीमत पर बिक्री का यह मामला पहला नहीं है। अन्य राज्यों में भी इस तरह की शिकायतें सामने आई हैं, और कुछ मामलों में कठोर कार्रवाई की गई है। उदाहरण के लिए:

  • हिमाचल प्रदेश: सितंबर 2023 में, कांगड़ा जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने सुनिल वाइन शॉप को एमआरपी से अधिक कीमत वसूलने के लिए 25,000 रुपये का जुर्माना और 10,000 रुपये के मुकदमे के खर्च का भुगतान करने का आदेश दिया। आयोग ने यह भी सुझाव दिया कि शराब की कीमतें दुकानों में स्पष्ट रूप से प्रदर्शित की जाएं।
  • आंध्र प्रदेश: दिसंबर 2024 में, आंध्र प्रदेश सरकार ने एमआरपी उल्लंघन के लिए शराब विक्रेताओं पर 5 लाख रुपये का जुर्माना और बार-बार उल्लंघन पर लाइसेंस रद्द करने की नीति लागू की।
  • उत्तर प्रदेश: मई 2020 में, उत्तर प्रदेश सरकार ने एमआरपी से अधिक कीमत वसूलने वाले शराब विक्रेताओं के लिए पहली बार 75,000 रुपये, दूसरी बार 1.5 लाख रुपये का जुर्माना, और तीसरी बार लाइसेंस रद्द करने की घोषणा की।

ये उदाहरण दर्शाते हैं कि शराब की अधिक कीमत पर बिक्री एक राष्ट्रीय समस्या है, और विभिन्न राज्य सरकारें इसे रोकने के लिए कदम उठा रही हैं। मध्य प्रदेश में भी इस दिशा में सख्त नीतियों की आवश्यकता है।


समाधान के लिए सुझाव

इस समस्या के समाधान के लिए निम्नलिखित उपाय किए जा सकते हैं:

  1. डिजिटल ट्रैकिंग सिस्टम: शराब की बिक्री को ट्रैक करने के लिए एक डिजिटल सिस्टम लागू किया जाए, जिसमें प्रत्येक बोतल का क्यूआर कोड स्कैन कर उपभोक्ता उसकी एमआरपी और वैधता की जांच कर सके।
  2. पारदर्शिता: सभी शराब दुकानों में कीमत सूची को स्पष्ट रूप से प्रदर्शित करना अनिवार्य किया जाए।
  3. सख्त दंड: एमआरपी उल्लंघन के लिए भारी जुर्माना और लाइसेंस रद्द करने जैसे कठोर दंड लागू किए जाएं।
  4. उपभोक्ता जागरूकता: उपभोक्ताओं को उनके अधिकारों के बारे में जागरूक करने के लिए अभियान चलाए जाएं। राष्ट्रीय उपभोक्ता हेल्पलाइन (1800-11-4000) और स्थानीय उपभोक्ता मंचों के बारे में जानकारी दी जाए।
  5. आबकारी विभाग में सुधार: विभाग के कर्मचारियों की जवाबदेही सुनिश्चित की जाए, और भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने के लिए नियमित ऑडिट किए जाएं।

मध्य प्रदेश हाई कोर्ट द्वारा शराब की अधिक कीमत पर बिक्री के खिलाफ नोटिस जारी करना एक स्वागतयोग्यकदम है। यह मामला उपभोक्ता अधिकारों, सरकार के राजस्व, और शराब व्यापार में पारदर्शिता के महत्व को रेखांकित करता है। याचिकाकर्ता की यह पहल न केवल मध्य प्रदेश के उपभोक्ताओं के लिए, बल्कि पूरे देश के लिए एक मिसाल बन सकती है।

आने वाले हफ्तों में कोर्ट के फैसले और सरकार की कार्रवाई पर सभी की नजरें टिकी रहेंगी। यदि इस मामले में सख्त कदम उठाए गए, तो यह न केवल उपभोक्ताओं को राहत देगा, बल्कि शराबव्यापार में अनैतिक प्रथाओं पर भी अंकुश लगेगा। यह समय है कि सरकार और आबकारीविभाग इससमस्या को गंभीरता से लें और उपभोक्ताओं के हितों की रक्षा करें।


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