शीतला सप्तमी कब है? पूजन विधि, महत्व और इसे मनाने वाले राज्य कौन से हैं?
Sheetala Saptami | शीतला सप्तमी हिंदू धर्म का एक महत्वपूर्ण त्योहार है, जो देवी शीतला को समर्पित है। यह पर्व विशेष रूप से बच्चों और परिवार की सेहत के लिए मनाया जाता है। इस लेख में हम शीतला सप्तमी कब है, इसकी पूजन विधि, इसका महत्व, और इसे किन राज्यों में मनाया जाता है, इन सभी पहलुओं पर विस्तार से चर्चा करेंगे।
शीतला सप्तमी कब है?
शीतला सप्तमी हर साल चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की सप्तमी तिथि को मनाई जाती है। यह त्योहार आमतौर पर होली के सात दिन बाद पड़ता है। वर्ष 2025 में शीतला सप्तमी की तारीख 21 मार्च है। पंचांग के अनुसार, सप्तमी तिथि 21 मार्च को सुबह 02:45 बजे शुरू होगी और 22 मार्च को सुबह 04:23 बजे समाप्त होगी। उदया तिथि के आधार पर शीतला सप्तमी 21 मार्च, शुक्रवार को मनाई जाएगी।
हालांकि, कुछ क्षेत्रों में यह पर्व शीतला अष्टमी के साथ भी जोड़ा जाता है, जो अगले दिन यानी 22 मार्च 2025 को होगी। कई जगहों पर लोग होली के बाद पहले सोमवार या गुरुवार को भी शीतला माता की पूजा करते हैं। इसके अलावा, गुजरात में शीतला सप्तमी को जन्माष्टमी से एक दिन पहले कृष्ण पक्ष की सप्तमी को भी मनाया जाता है। इस तरह, यह त्योहार साल में दो बार मनाया जा सकता है – एक बार चैत्र मास में और दूसरी बार श्रावण मास में। लेकिन चैत्र मास की शीतला सप्तमी को अधिक महत्वपूर्ण माना जाता है।
शीतला सप्तमी पूजा का शुभ मुहूर्त सुबह 06:01 बजे से शाम 06:08 बजे तक रहेगा, जो कुल 12 घंटे और 7 मिनट की अवधि है। इस समय में शीतला माता की पूजा करना सबसे उत्तम माना जाता है।
शीतला सप्तमी की पूजन विधि क्या है?
शीतला सप्तमी की पूजन विधि सरल लेकिन विशिष्ट है। इस दिन शीतला माता को बासी भोजन का भोग लगाया जाता है, जो इस त्योहार की सबसे खास परंपरा है। नीचे शीतला सप्तमी की पूजन विधि को चरणबद्ध तरीके से बताया गया है:
- प्रातः स्नान: शीतला सप्तमी के दिन सुबह सूर्योदय से पहले उठकर ठंडे पानी से स्नान करें। गर्म पानी का उपयोग इस दिन वर्जित है, क्योंकि शीतला माता को ठंडक पसंद है।
- व्रत संकल्प: स्नान के बाद स्वच्छ वस्त्र पहनें और शीतला माता का आशीर्वाद पाने के लिए व्रत का संकल्प लें। यह व्रत विशेष रूप से बच्चों और परिवार की सेहत के लिए रखा जाता है।
- पूजा की तैयारी: एक चौकी पर लाल या पीला कपड़ा बिछाएं। उस पर शीतला माता की मूर्ति या चित्र स्थापित करें। उनके सामने एक जल से भरा कलश रखें।
- भोग तैयार करना: शीतला सप्तमी से एक दिन पहले यानी 20 मार्च की रात को भोजन तैयार करें। इसमें मीठे चावल (गुड़ या गन्ने के रस से बने), दही, रोटी, चने की दाल, हलवा, पूड़ी आदि शामिल हो सकते हैं। यह भोजन बासी होना चाहिए, क्योंकि ताजा भोजन इस दिन नहीं बनाया जाता।
- पूजा शुरू करना: सुबह शुभ मुहूर्त में शीतला माता को जल अर्पित करें। इसके बाद रोली, मेहंदी, हल्दी, अक्षत (चावल), और फूल चढ़ाएं। आटे का दीया जलाएं और घी से भरी बाती रखें।
- भोग अर्पण: तैयार किया गया बासी भोजन शीतला माता को भोग के रूप में चढ़ाएं। इस दिन गर्म भोजन या पेय पदार्थ का सेवन नहीं किया जाता।
- कथा और स्तोत्र पाठ: शीतला सप्तमी की व्रत कथा सुनें या पढ़ें। इसके बाद शीतलाष्टक का पाठ करें, जिसे भगवान शंकर ने रचा माना जाता है। यह स्तोत्र शीतला माता की महिमा का गुणगान करता है।
- आरती और प्रार्थना: शीतला माता की आरती करें और परिवार की सुख-शांति व स्वास्थ्य के लिए प्रार्थना करें।
- प्रसाद वितरण: पूजा के बाद बासी भोजन को प्रसाद के रूप में परिवार के सदस्यों में बांटें। कुछ क्षेत्रों में इसे कुम्हार को दान करने की भी परंपरा है।
- घर की शुद्धि: पूजा में चढ़ाए गए जल को घर में छिड़कें और मुख्य द्वार पर हल्दी से हाथ के पांच-पांच छापे लगाएं। इससे घर में सकारात्मक ऊर्जा बनी रहती है।
शीतला सप्तमी की यह पूजन विधि स्वच्छता और स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता को भी दर्शाती है। इस दिन सिलाई, चक्की चलाना या सिर धोना वर्जित माना जाता है।
शीतला सप्तमी का महत्व क्या है?
शीतला सप्तमी का महत्व हिंदू धर्म में बहुत अधिक है। यह त्योहार शीतला माता को समर्पित है, जिन्हें दुर्गा और पार्वती का अवतार माना जाता है। स्कंद पुराण में शीतला माता का उल्लेख मिलता है, जहां उन्हें चेचक, खसरा, और अन्य संक्रामक रोगों को नियंत्रित करने वाली देवी कहा गया है। उनका नाम “शीतला” शब्द से आया है, जिसका अर्थ है “ठंडा”। यह उनकी शीतलता का प्रतीक है, जो रोगों को शांत करती है।
शीतला सप्तमी का महत्व निम्नलिखित बिंदुओं से समझा जा सकता है:
- स्वास्थ्य और रोगों से मुक्ति: इस दिन व्रत और पूजा करने से परिवार के सदस्यों को चेचक, बुखार, फोड़े-फुंसी, और आंखों से जुड़ी बीमारियों से सुरक्षा मिलती है। प्राचीन काल में, जब चिकित्सा सुविधाएं सीमित थीं, लोग शीतला माता की शरण में जाते थे।
- स्वच्छता का संदेश: शीतला माता अपने हाथ में झाड़ू, सूप, नीम के पत्ते और कलश लिए दिखाई देती हैं। ये सभी स्वच्छता और स्वास्थ्य के प्रतीक हैं। नीम के पत्ते कीटाणुओं को नष्ट करते हैं, और कलश स्वच्छ जल का महत्व बताता है।
- परिवार की सुख-शांति: महिलाएं इस व्रत को बच्चों की लंबी आयु और अच्छे स्वास्थ्य के लिए रखती हैं। इससे घर में सुख-शांति बनी रहती है।
- ऋतु परिवर्तन का संकेत: शीतला सप्तमी शीत ऋतु के अंत और ग्रीष्म ऋतु के आगमन के समय मनाई जाती है। इस समय मौसम बदलता है, और बीमारियों का खतरा बढ़ता है। शीतला माता की पूजा से इन खतरों से बचाव होता है।
- आध्यात्मिक लाभ: शीतलाष्टक का पाठ और शीतला माता की भक्ति से मन को शांति मिलती है। यह भक्तों को नकारात्मक ऊर्जा से मुक्ति दिलाती है।
एक प्रसिद्ध व्रत कथा के अनुसार, राजा इंद्रायुम्ना की बेटी शुभकारी ने शीतला सप्तमी का व्रत रखा। उसने एक मृत ब्राह्मण को जीवनदान देने के लिए शीतला माता से प्रार्थना की, और माता ने उसकी प्रार्थना स्वीकार की। इस घटना ने शीतला सप्तमी के महत्व को और बढ़ा दिया।
शीतला सप्तमी किन राज्यों में मनाई जाती है?
शीतला सप्तमी मुख्य रूप से भारत के उत्तरी और पश्चिमी राज्यों में मनाई जाती है, लेकिन इसका प्रभाव देश के अन्य हिस्सों में भी देखा जाता है। इसे मनाने वाले प्रमुख राज्य निम्नलिखित हैं:
- उत्तर प्रदेश: यहां शीतला सप्तमी और शीतला अष्टमी दोनों बड़े उत्साह से मनाई जाती हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में इसे बसौड़ा के नाम से जाना जाता है।
- राजस्थान: राजस्थान में शीतला माता की पूजा स्वास्थ्य और स्वच्छता के लिए की जाती है। यहां भी बासी भोजन की परंपरा प्रचलित है।
- गुजरात: गुजरात में शीतला सप्तमी को शीतला सातम कहा जाता है। इसे चैत्र मास और श्रावण मास दोनों में मनाया जाता है। लोग पिछले दिन का भोजन खाते हैं और माता की पूजा करते हैं।
- मध्य प्रदेश: मध्य भारत में भी यह पर्व लोकप्रिय है। यहां माताएं बच्चों की सेहत के लिए व्रत रखती हैं।
- दक्षिणी राज्य: दक्षिण भारत में शीतला माता को मरिअम्मन या पोलेरम्मा के रूप में पूजा जाता है। आंध्र प्रदेश और कर्नाटक में इसे पोलला अमावस्या के नाम से जाना जाता है।
हालांकि शीतला सप्तमी का सबसे अधिक प्रचलन उत्तरी राज्यों में है, लेकिन यह त्योहार पूरे भारत में किसी न किसी रूप में मनाया जाता है। यह विभिन्न संस्कृतियों को जोड़ने वाला एक अनूठा पर्व है।
शीतला सप्तमी से जुड़ी अन्य रोचक बातें
शीतला माता का स्वरूप: शीतला माता को गधे पर सवार दिखाया जाता है। उनके हाथ में झाड़ू, सूप, नीम के पत्ते और कलश होते हैं। यह स्वरूप स्वच्छता और रोगमुक्ति का संदेश देता है।
बसौड़ा पर्व: शीतला सप्तमी को कई जगह बसौड़ा कहा जाता है, क्योंकि इसमें बासी भोजन खाया जाता है। यह परंपरा गर्मी में भोजन को सुरक्षित रखने की प्राचीन प्रथा से जुड़ी हो सकती है।
नीम का महत्व: नीम के पत्तों का उपयोग इस दिन विशेष रूप से किया जाता है, क्योंकि यह औषधीय गुणों से भरपूर है।
शीतला सप्तमी एक ऐसा त्योहार है जो स्वास्थ्य, स्वच्छता और आध्यात्मिकता का संगम है। यह 21 मार्च 2025 को मनाया जाएगा, और इसकी पूजन विधि में बासी भोजन का भोग और ठंडे पानी से स्नान शामिल है। इसका महत्व रोगों से मुक्ति और परिवार की सुख-शांति में निहित है। यह पर्व मुख्य रूप से उत्तर प्रदेश, राजस्थान, गुजरात, और अन्य राज्यों में मनाया जाता है। शीतला माता की भक्ति से न केवल शारीरिक बल्कि मानसिक शांति भी प्राप्त होती है। इस शीतला सप्तमी, आप भी इस परंपरा को अपनाएं और अपने परिवार के लिए माता का आशीर्वाद लें।
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