उज्जैन महाकाल सम्मेलन के दौरान केंद्रीय मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने उज्जैन भारतीय ज्ञान परंपरा की एक जीवंत प्रयोगशाला बताया। उन्होंने कहा कि यह शहर केवल आस्था का केंद्र नहीं, बल्कि विज्ञान, संस्कृति, साहित्य और अध्यात्म का अद्भुत संगम है, जो भारत की समृद्ध सभ्यता को दर्शाता है।
उज्जैन महाकाल सम्मेलन में भारतीय ज्ञान परंपरा पर जोर
उज्जैन महाकाल सम्मेलन में बोलते हुए धर्मेंद्र प्रधान ने कहा कि उज्जैन-आवंतिका भारत की प्राचीन सभ्यता का प्रतीक है। उन्होंने बताया कि भारत के प्रमुख आध्यात्मिक केंद्र जैसे काशी, कांची और पुरी धाम केवल धार्मिक स्थल नहीं हैं, बल्कि ये भारतीय ज्ञान परंपरा के जीवंत उदाहरण हैं, जहां विज्ञान और आध्यात्म का गहरा संबंध देखने को मिलता है।
उन्होंने यह भी कहा कि जब इन स्थानों का गहराई से अध्ययन किया जाता है, तो यह स्पष्ट होता है कि ये केवल पूजा के केंद्र नहीं, बल्कि ज्ञान के भंडार हैं, जहां खगोलशास्त्र, वास्तुकला, साहित्य और सांस्कृतिक परंपराएं विकसित हुई हैं।
विज्ञान और अध्यात्म के संगम का प्रतीक बना उज्जैन महाकाल सम्मेलन
उज्जैन महाकाल सम्मेलन में धर्मेंद्र प्रधान ने यह भी कहा कि विज्ञान बिना अध्यात्म के अधूरा है। उन्होंने उज्जैन को एक ऐसा स्थान बताया, जहां वैज्ञानिक और सांस्कृतिक दृष्टिकोण एक साथ विकसित हुए हैं। यह शहर भारत की उस परंपरा का प्रतिनिधित्व करता है, जिसमें ज्ञान के विभिन्न आयाम एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं।
कार्यक्रम में मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव भी मौजूद रहे। दोनों नेताओं ने उज्जैन के प्लेनेटेरियम परिसर में आयोजित ‘महाकाल: द मास्टर ऑफ टाइम’ अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन का उद्घाटन किया। इसके साथ ही उज्जैन साइंस सेंटर का उद्घाटन और कई विकास परियोजनाओं की आधारशिला भी रखी गई।
सिंहस्थ 2028 की तैयारियों को मिली गति
उज्जैन महाकाल सम्मेलन के दौरान ‘सम्राट विक्रमादित्य: द हेरिटेज’ परियोजना और 4-लेन उज्जैन बायपास सहित कई महत्वपूर्ण परियोजनाओं की शुरुआत की गई। ये सभी योजनाएं आगामी सिंहस्थ 2028 की तैयारियों को ध्यान में रखते हुए शुरू की गई हैं।
उज्जैन महाकाल सम्मेलन ने एक बार फिर यह साबित किया है कि भारत की सांस्कृतिक और वैज्ञानिक विरासत आज भी प्रासंगिक है और वैश्विक स्तर पर प्रेरणा देने की क्षमता रखती है।











